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महिषासुर वध मॉं ने किया

शंख बज रहे, उलूध्वनि ( मंगलध्वनि) हो रही कि महिषासुर वध मॉं ने किया  माता ने भक्तों का भव से बेड़ा पार किया न  त्रिलोक में दैत्य ने त्रास मचाया   देवों ने मिल मॉं का ध्यान लगाया  तब सिंह सवार मॉं ने दरस दिखाया  माता ने भक्तों का जीवन तार दिया  शंख बज रहे, उलूध्वनि हो रही  कि महिषासुर वध मॉं ने किया  माता ने भक्तों का भव से बेड़ा पार किया  देवों ने मिल मॉं को शस्त्र दिए रूप देख मॉं का सब दैत्य डरे  नौ दिन मॉं , और दानव में , युद्ध चला दसवें दिन में मॉं ने सबका संहार किया  शंख बज रहे उलूध्वनि हो रही  कि महिषासुर वध मॉं ने किया  माता ने भक्तों का भव से बेड़ा पार किया 

गढ़ दिया लाल अपने

जब गौरा चलीं स्नान करने तब लेप लगाईं तन पर अपने तन से लेप उतारा माँ ने उसी लेप से गढ़ दिया लाल अपने लाल को मॉं ने प्रहरी बनाया शिव जी से उसने रण मचाया  रुद्र ने  काट दिए शीश उसके  मॉं देख बिलखीं लाल अपने जब गौरा चलीं स्नान करने  तब लेप लगाईं तन पर अपने तन से लेप उतारा मॉं ने  उसी लेप से गढ़ दिया लाल अपने  बेहाल गौरा को देख भोला डरे सब  देव मिल मॉं से विनती करें गज शीश से लाल में प्राण मिले मॉं हर्षाईं देख लाल अपने  जब गौरा चलीं स्नान करने  तब लेप लगाईं तन पर अपने  तन से लेप उतारा मॉं ने उसी लेप से गढ़ दिया लाल अपने 

मॉं भी इंसान है

माँ को देते भगवान का दर्जा , लेकिन मॉं भी आखिर है एक इंसान । दोषरहित वह भी नहीं  कभी अनजाने , कभी नादानी में  हो जाती उससे भी भूल । फिर भी बच्चों के हित का ही   मन‌ में रखती भाव । और ऐसी कोई मॉं नहीं जिससे  कभी ना हुई हो कोई भूल । बेटा हो या बेटी , आज की मॉं करती दोनों से प्रेम । रिश्ता मॉं का बच्चों से ऐसा टूट ना पाता , लगने से ठेस । बच्चों के संकट को सोच , रहती वह प्रतिपल आकुल । मॉं को जैसे होता भान , वैसे बच्चों को होता , मॉं के दुःख का भान । बेटा-बेटी में अंतर इतना— बेटी को कभी माँ थी सिखाती, अब माँ को बेटी है सिखाती, दुनियादारी की समझ भी बताती। लेकिन माँ ने देखी है दुनिया ज्यादा, इंसानों की परख भी है ज्यादा  फिर भी अनजाने में होती त्रुटि , क्योंकि वह भी है एक इंसान ।।

जाना अधिकार है , बुलाया जाना सुख

          आज का यह लेख महिलाओं के मन में उमड़ते एक सवाल के विषय में । वो भी उन महिला विशेष वर्ग के विषय में जो मेरी हमउम्र हैं , या मुझसे कुछ साल बड़ी या कुछ साल छोटी ।              मुझे लोकगीत सुनना पसंद है और गाना गाना भी सीखती हूॅं तो इसी क्रम में एक दिन मैंने बंदिनी फिल्म के "अब के बरस भेज भैया को बाबुल " सीखने की इच्छा जाहिर की । उस वक्त मैंने इस गीत की गहराई को समझा । उसी दौरान लोकगायिका उर्मिला श्रीवास्तव जी का "नइहरे से भईया नाही अइले हो रामा, बितले फगुनवा " सुना । तभी से उधेड़बुन में हूॅं ।               क्या हम महिलाओं को मायके से बुलावे के बाद ही मायके जाना चाहिए ? हम महिलाओं का मायके से लगाव छूटना असंभव है । जिसने हमें जन्म दिया , पाला - पोसा उससे भावनात्मक जुड़ाव जीवन भर बना रहता है । विज्ञान भी यही कहता है - माॅं की कुछ कोशिकाएं बच्चे के शरीर में कई वर्षों यहाॅं तक की जीवन भर रह सकती हैं । इसी कारण मायके और वहाॅं के रिश्तों से भावनात्मक अलगाव भी आसान नहीं होता ।     ...

मन की गाॅंठें

हो जाती हैं अब  बातें बंद , छोटी - छोटी बातों पर यूॅं ही होती बातें बंद । कभी जो थे डपटते , पूछते थे हाल , समझाते थे जीवन के पाठ , छेड़ने पर ठहाका मार हॅंसते थे । तुम सही , हम सही की जंग में कर देते हैं बातें बंद । अहं के टकराव से  रिश्तों का ऑंगन सूना लगता है । जीवन क्षणभंगुर है ,  ज्ञान सभी को है इसका । फिर छोटी-छोटी बातों पर क्यों करते बातें बंद ? सुलझा लो मन की गॉंठें चुभते हैं चुप्पी के तीर । चुप्पी से तुम भी घायल , मैं भी घायल । समाधान जब एक है , तो छोड़ अहं को , फिर से कर लो बातें । रिश्तों के ऑंगन में होगी हरियाली  जब तोड़ोगे तुम चुप्पी की जाली ।।

बोर्ड रिजल्ट और समाज की सोच

           सारे बोर्ड के रिजल्ट आ चुके हैं और इस समय मैं विचलित हूॅं । इसलिए नहीं कि मेरे किसी खास का नम्बर कम आया है बल्कि इसलिए कि क्या जिन बच्चों ने बोर्ड की परिक्षा दी है , उनसे उनका रिजल्ट पूछना चाहिए या नहीं ।              मेरे बच्चों का कहना है कि ," तुम क्यों रिजल्ट पूछती हो, लोग खुद ही बता देंगे ।"  वैसे मैं केवल अपने खास का ही बोर्ड रिजल्ट पूछती हूॅं , किसी भी कॉम्पटीशन का नहीं ।            मेरा बेटे ने जब दसवीं की परीक्षा दी थी‌ तब वो घर का पहला बच्चा था तो उस समय मैंने खुद सबको फोन से सूचित किया था , जिनको सूचित नहीं कर पाई उन्होंने फोन कर पूछा और मैंने सबको बताया भी । ज्यादातर लोगों को केवल पर्सेंट से मतलब था केवल भइया ने ही हर विषय का नंबर पूछा था । वो ना केवल हर विषय का नंबर पूछता है वरन् भतीजों का नंबर अलग-अलग बताता भी है ।              बच्चों का बोर्ड का रिजल्ट क्यों नहीं पूछना चाहिए , मुझे समझ नहीं आता । मुझे लगता है कि बच्चों से ज्यादा...

बीते पल

याद आते हो तुम और, वो पल , जिनमें करते थे हम बेहिसाब बेमतलब की बातें । लड़ते थे झगड़ते थे फिर भी करते थे बातें बेहिसाब , बिन मिले इतनी बातें करते थे कैसे हम जनाब ? फिर, ना जाने क्यों  बंद हो गईं बातें  खैर,कोई गिला नहीं ना है कोई शिकायत , उन पलों को याद कर  जी लेती हूॅं आज को क्या तुम्हें भी याद आते हैं  वो बीते पल ? मुझे तो याद आते हो तुम,  बस तुम ....।।

महिमा माॅं बगलामुखी की

 बगलामुखी माॅं की महिमा अपार  सुन लो कथा उनकी बारम्बार  धरती पर जब संकट छाया श्री हरि ने माॅं का ध्यान लगाया  तब ही माॅं ने लिया अवतार  सुन लो कथा उनकी बारम्बार  बगलामुखी माॅं की महिमा अपार  सुन लो कथा उनकी बारम्बार  पीत वर्ण में अद्भुत लगतीं  जिह्वा शत्रु की कर में रखतीं  संकट हरतीं हैं मॉं निर्विकार  सुन लो कथा उनकी बारम्बार  बगलामुखी माॅं की महिमा अपार  सुन लो कथा उनकी बारम्बार ।।

आ रहे हैं श्री राम

सज गया अयोध्या धाम  गा रहे सब मंगल गान  नगर में /अवध में आ रहे हैं श्री राम  चौदह वर्ष वन में बिताया रावण वध कर मान बढ़ाया  सिया लखन संग लौटे धाम अवध में आ रहे हैं श्री राम  सज गया अयोध्या धाम  गा रहे मंगल गान  नगर में/अवध में आ रहे हैं श्री राम  सुन खबरिया माॅं हर्षाईं / मुस्काईं आरती थाल सजा कर लाईं देख  भरत - शत्रुघ्न निहाल अवध आ रहे हैं श्री राम सज गया अयोध्या धाम  गा रहे सब मंगल गान  अवध में / नगर में आ रहे हैं श्री राम  कोयल कूके मोर इतराएं वन-उपवन पुष्प बरसाएं  नर - नारी सब करें प्रणाम  अवध में/ नगर में आ रहे हैं श्री राम ।। सज गया अयोध्या धाम  गा रहे सब मंगल गान  अवध में / नगर में आ रहे हैं श्री राम।।

दिव्य कुंभ

 ये दिव्य कुंभ है , भव्य कुंभ है , महाकुंभ है अपना इसमें स्नान - ध्यान का है हर प्राणी का सपना  दानव - दैत्य में हुआ रण लेने को अमृत कलसा उज्जैन , प्रयाग , नासिक ,हरिद्वार में तब अमृत कण बरसा  है संगम रेती , प्रयाग धाम में कल्पवास का सपना  ये दिव्य कुंभ है , भव्य कुंभ है , महाकुंभ है अपना इसमें स्नान - ध्यान का है हर प्राणी का सपना  संतों की भी भव्य कुंभ में होती स्नान की इच्छा  स्नान राजसी के हों साक्षी माॅंगे पुण्य की भिक्षा करें दान सत्संग करें सब देखें मोक्ष का सपना ये दिव्य कुंभ है , भव्य कुंभ है , महाकुंभ है अपना इ समें स्नान - ध्यान का है हर प्राणी का सपना ।।

उठो माॅं श्रृंगार करो

 उठो मात श्रृंगार करो अब तुम्हें धरा पर आना है माथे पे लगा लो तुम बिंदिया   सिंदूर से भर लो तुम मंगिया नैनों में ममता का भाव लिए  अब तुम्हें धरा पर आना है  तुम उठो माॅं श्रृंगार करो  अब तुम्हें धरा पर आना है  हस्त में अपने कमल लिए  और हाथ में अपने शंख लिए  आंचल में भर आशीष लिए  अब तुम्हें धरा पर आना है  तुम उठो माॅं श्रृंगार करो  अब तुम्हें धरा पर आना  है  कर में अपने त्रिशूल लिए  और सिंह की सवारी किए दुष्टों का वध करने के लिए  अब तुम्हें धरा पर आना है  तुम उठो माॅं श्रृंगार करो  अब तुम्हें धरा पर आना है ।।

सोचा ना था

सदा तुमने अपने मन की की, ना सुनते थे बात किसी की। फिर क्यों मानने लगे थे मेरी, जब फोन पर बताते थे तकलीफ़ अपनी। मैं समझाती— डॉक्टर का कहा कर लो थोड़ा-थोड़ा, तुम कहते— कहती हो बिटिया, तो कर लूँगा। मेरी बात का मान भी रखते थे, यह माँ मुझे बताती थीं— तुम इतनी मानोगे मेरी, सोचा न था। वीडियो कॉल पर कहा था तुमने— "तकलीफ़ बहुत है, बिटिया"। तब मैंने कहा था— "ठीक है पापा, अब तुम सो जाओ।" और तुमने यह भी मान लिया... ले ली चिर-निद्रा। सोचा न था— कहा मेरा तुम यूँ मानोगे।

असहाय वृक्ष

 छाई निराशा वृक्षों में,  निसहाय खड़े सब देखते , कटते अपने  साथियों को, व्यथित हो, मानो बोल रहे - संगी - साथी बिछड़े मेरे, सूने हैं वन - उपवन   लुप्त हुई सावन की हरियाली  नीड़ पंछियों के भी खाली ।  दुर्बल हुआ मूल मेरा,  काया भी अब रुग्ण हुई, प्रकृति, जिससे मिलती शक्ति  वह भी अब क्षीण हुई । होगा मौसम में परिवर्तन,   परिवर्तन का, दोष ना देना ,  दोषी हो तुम सब ही,  विकास के नाम पर  निष्ठुर बनकर हमको काटा ।।

बात ही बात

         यूपी बोर्ड के हाई स्कूल में हिंदी का पहला अध्याय प्रताप नारायण मिश्र का निबंध "बात " है । गाहे-बगाहे यह निबंध याद आ ही जाता है । क्योंकि बिना 'बात' कुछ हो ही नहीं सकता और लोग 'बातें' भी कितनी करते हैं । पहले सीमित संसाधन थे अब तो संसाधनों की भी कमी नहीं । फेसबुक , इंस्टाग्राम , ट्विटर, व्हाट्सएप, यूट्यूब, ब्लॉग सब पर 'बातें' ही तो होती हैं । अभी जो मैं लिख रही तो मैं भी अपने मन में आई 'बात' ही लिख रही हूॅं ।         इंसान जब दो साल का होता है तभी बोलना सीख जाता है । लेकिन कब , कहाॅं , क्या बोलना चाहिए यह जीवन भर नहीं सीख पाता । किस 'बात' का दूसरे इंसान पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह भी नहीं सोचते । इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिनको बाद में एहसास होता है कि उन्होंने गलत बोल दिया है वो क्षमा भी मांग लेते हैं और कुछ 'क्षमा' शब्द से ही अनभिज्ञ होते हैं, वो ये मानने को तैयार ही नहीं होते कि वो दिल दुखाने वाली 'बात' बोल भी सकते हैं ।               अब वो 'बात' जो हम लोग बच्चों को चिढ़ाने के लिए बिना सोचे-समझे ब...

अंधविश्वास मर्ज का इलाज

     आज सुनीता बहुत खुश थी । हो भी क्यों ना , आखिर आज वो होने जा रहा था जो वो महीनों से चाह रही थी । ऐसे तो काम में वो फुर्तीली थी , घर का काम सबके साथ मिलकर निपटा कर ही ऑफिस जाती थी । लेकिन आज उसके काम करने में अलग ही फुर्ती थी । रसोई का काम करते-करते वह कुछ गुनगुना भी रही थी । सुनीता की सास सुनीता को खुश देख मंद मंद मुस्कुरा रही थीं और उसकी समझदारी पर गर्व भी कर रहीं थीं ।       एक वर्ष पूर्व ही सुनीता का ब्याह सुनील से हुआ था । नये परिवार में वह अच्छे से रच - बस गयी थी । सास - ससुर , छोटी ननद सब बहुत अच्छे थे । किसी बात की कमी नहीं थी और सुनील, वो तो बहुत ही समझदार था, सुनीता का साथ देने को सदा तत्पर रहता था ।       सब कुछ ठीक था किन्तु सुनील के माता-पिता अंधविश्वासी थे । जब भी कोई अस्वस्थ होता तो डॉक्टर के पास ना जाकर ओझा और पंडित के पास जाते थे और पूजा-पाठ में व्यर्थ का पैसा खर्च करते थे यह सब सुनीता को बहुत खटकता था । एक दो बार उसने अपनी सास को समझाना‌ चाहा तो वो उससे नाराज हो गईं । ऐसे तो सुनील हर बात में उसका साथ देता था किन्तु इस माम...

कर्मकांड

    जन्म हुआ है तो मृत्यु निश्चित है । यह कहना गलत ना होगा कि गर्भ में ही मृत्यु का दिन निश्चित हो जाता है । मृत्यु पर लिखना अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन क्या करुॅं , दिलो-दिमाग में बहुत दिनों से उथल-पुथल चल रही ।        किसी अपने के जाने के उपरांत सब यह बोल कर सांत्वना देते हैं कि ," सब ऊपर वाले के हाथ में है ।" सच भी है कि सब ऊपर वाले के हाथ में है और हम केवल अपना कर्म कर सकते हैं । किसी की असमय मृत्यु निश्चित ही अत्यंत कष्टकारी होती है ।उनका जाना भी कष्टकारी होता है जो‌ आयु पूर्ण कर जाते हैं और वो अगर माता-पिता हों‌ तब कष्ट थोड़ा ज्यादा होता है । किंतु पापा के जाने के बाद यह लगा कि मृत्यु के बाद के कर्मकांड उससे ज्यादा कष्टकारी होते हैं । क्योंकि इससे पहले मैंने ये सब देखा नहीं था । (जो मैंने देखा और सुना है उसी के आधार पर लिख रही। वैसे मैं बहुत ज्यादा जानती नहीं । )      लोग कहते हैं कि तेरहवीं वगैरह करने का प्रावधान इसलिए किया गया कि लोग व्यस्तता में अपना दुःख भूल जाएं और मृतक की आत्मा को शांति मिले । सोचिए इसी में किसी की असमय मृत्यु हो त...

जब - जब माॅं को याद किया

 जब - जब माॅं को याद किया माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं  दुःख आए या सुख आए  माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं  हाथों में अपने त्रिशूल लिए माॅं, सिंह की सवारी किए  ऑंखों में अपने तेज लिए माॅं, ममतामई मुस्कान लिए  भक्तों पर अपनी कृपा करने , वो दौड़ी - दौड़ी आती हैं  जब - जब माॅं को याद किया माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं  दुःख आए या सुख आए  माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं  हाथों में अपने शंख लिए माॅं , गुड़हल माला पहने हुए  चक्षु में अपने शांति लिए माॅं, करुणा का भाव मन में लिए  भक्तों को आशीष देने, वो दौड़ी - दौड़ी आती हैं  जब - जब माॅं को याद किया  माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं  दुःख आए या सुख आए  माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं।।

बिटिया रानी

 घर में आई बिटिया रानी मेरी प्यारी सी गुड़िया रानी आँखें भींचे मुट्ठी बाँधे आई है पापा की प्यारी उसकी किलकारी से घर है चहकता नन्हे पैरों में पहन वो पायल  जब रुनझुन - रुनझुन चलती तब मेरा मन विह्वल होता दादा जी का ऐनक छिपाती  दादी को छड़ी पकड़ाती  और मुझे शीतल जल दे ताली बजा वह खुश हो जाती। कभी खेलती गुड्डे - गुड़ियों से कभी उठा बैट खिलाड़ी बन जाती कभी विद्यार्थी मुझे बना शिक्षक बन मुझे पढ़ाती और कभी चुनरी को ओढ़ दुल्हन भी बन जाती  दुल्हन बन जब मुझे रिझाती तब वह मुझको कम ही भाती तत्क्षण उसकी सखी मैं बन जाती और उसको यह समझाती प्यारी बिटिया एक बात जान लो अपने जीवन के मूल्य पहचान लो शिक्षा, स्वावलंबन, उठाकर सिर को जीना है यही स्त्री का सच्चा गहना इसको है तुम धारण करना इस आभूषण से ही है तुमको संवरना आभूषित हो इस गहने से जग में मेरा नाम तुम करना॥

संकल्प शक्ति

    क्या कोई स्त्री विवाहोपरांत 30+ या‌ 40+ पर अपनी योग्यता के आधार पर अपनी पहचान नहीं बना सकती ? 50+ इसलिए नहीं लिख रही कि तब तक उनके पति सरकारी पद से सेवानिवृत्त हो गए होते हैं या होने वाले होते हैं।         प्रत्येक इंसान को स्वयं की पहचान अवश्य बनानी चाहिए ऐसा मेरा मानना है। आज इस विषय पर इसलिए लिख रही कि मैं जानती हूॅं कि बहुतों को ऐसा लगता है कि मैं अपने पति के सरकारी पद का इस्तेमाल कर "ऑल इंडिया रेडियो" में पहुॅंची हूॅं । हाॅं, बस वो मेरे समक्ष नहीं बोलते।      मैंने सबसे पहले 2015 में पहली कहानी "बालमन" लिखी थी। जिसको पढ़ने के बाद पतिदेव ने कहा "तुम लिखती क्यों नहीं ? लिखा करो।" उस वक्त लगा ऐसे ही कह दिए होंगे । लेकिन यह कहने के पीछे एक बहुत बड़ा कारण यह था कि मैं 2014 की लम्बी अस्वस्थता के कारण अवसाद से ग्रसित थी और अब मैं शारीरिक रूप से गृहकार्य करने में भी समर्थ नहीं थी । 2014 से पहले बच्चों को मैं ही पढ़ाती थी लेकिन अब उसमें भी मेरा मन नहीं लगता था। जबकि बच्चों को पढ़ाना मुझे बहुत पसंद था। इसीलिए पतिदेव को लगा कि मैं उसी में व्यस्...

तपती धरा

 बादल आए बादल आए  काले - काले बादल आए तपती धरती की प्यास बुझाने जल से भरे बादल आए देख अम्बर में जलधर को  गाछ , धरा , सरिता पुलकित  पशु - पक्षी संग हलधर हर्षित वृक्ष झूम - झूम कर  मेघों का कर रहे हैं स्वागत बैलों संग कृषक भी झूम रहे किन्तु यह क्या ! घन को चीर निकला सूरज लगता रूठ गए फिर से पयोधर  जाते देख अम्बुद को हुए पशु - पक्षी व्याकुल नर - नारी भी आकुल खिन्न मन से सब मानुष शिकवा कर रहे धरा से क्यों बारम्बार बदल रहा मौसम ? तब क्रोधित हो धरती गरजी आक्रोशित स्वर में वह बोली नहीं आएँगे अब काले घन मैंने अपनी संतान दे  दिया तुम्हें कोष अमूल्य  पर तुम तो निकले अज्ञानी पर्वत , वृक्ष , नदी सब मेरे बालक दोहन कर इनका अपार अंक सूना कर दिया मेरा किन्तु कर रही हूँ विनती मैं गोद पुनः भर दो मेरी देखोगे फिर वैसी हरियाली समय बहुत नहीं है बीता वृक्ष लगा मुझे बचा लो ऋतुएँ होगी तब अनुकूल बात मेरी गाँठ बाँध लो कुदरत से खिलवाड़ त्याग दो