जाना अधिकार है , बुलाया जाना सुख
आज का यह लेख महिलाओं के मन में उमड़ते एक सवाल के विषय में । वो भी उन महिला विशेष वर्ग के विषय में जो मेरी हमउम्र हैं , या मुझसे कुछ साल बड़ी या कुछ साल छोटी । मुझे लोकगीत सुनना पसंद है और गाना गाना भी सीखती हूॅं तो इसी क्रम में एक दिन मैंने बंदिनी फिल्म के "अब के बरस भेज भैया को बाबुल " सीखने की इच्छा जाहिर की । उस वक्त मैंने इस गीत की गहराई को समझा । उसी दौरान लोकगायिका उर्मिला श्रीवास्तव जी का "नइहरे से भईया नाही अइले हो रामा, बितले फगुनवा " सुना । तभी से उधेड़बुन में हूॅं । क्या हम महिलाओं को मायके से बुलावे के बाद ही मायके जाना चाहिए ? हम महिलाओं का मायके से लगाव छूटना असंभव है । जिसने हमें जन्म दिया , पाला - पोसा उससे भावनात्मक जुड़ाव जीवन भर बना रहता है । विज्ञान भी यही कहता है - माॅं की कुछ कोशिकाएं बच्चे के शरीर में कई वर्षों यहाॅं तक की जीवन भर रह सकती हैं । इसी कारण मायके और वहाॅं के रिश्तों से भावनात्मक अलगाव भी आसान नहीं होता । ...