मन की गाॅंठें
हो जाती हैं अब बातें बंद , छोटी - छोटी बातों पर यूॅं ही होती बातें बंद । कभी जो थे डपटते , पूछते थे हाल , समझाते थे जीवन के पाठ , छेड़ने पर ठहाका मार हॅंसते थे । तुम सही , हम सही की जंग में कर देते हैं बातें बंद । अहं के टकराव से रिश्तों का ऑंगन सूना लगता है । जीवन क्षणभंगुर है , ज्ञान सभी को है इसका । फिर छोटी-छोटी बातों पर क्यों करते बातें बंद ? सुलझा लो मन की गॉंठें चुभते हैं चुप्पी के तीर । चुप्पी से तुम भी घायल , मैं भी घायल । समाधान जब एक है , तो छोड़ अहं को , फिर से कर लो बातें । रिश्तों के ऑंगन में होगी हरियाली जब तोड़ोगे तुम चुप्पी की जाली ।।