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बीते पल

याद आते हो तुम और, वो पल , जिनमें करते थे हम बेहिसाब बेमतलब की बातें । लड़ते थे झगड़ते थे फिर भी करते थे बातें बेहिसाब , बिन मिले इतनी बातें करते थे कैसे हम जनाब ? फिर, ना जाने क्यों  बंद हो गईं बातें  खैर,कोई गिला नहीं ना है कोई शिकायत , उन पलों को याद कर  जी लेती हूॅं आज को क्या तुम्हें भी याद आते हैं  वो बीते पल ? मुझे तो याद आते हो तुम,  बस तुम ....।।

महिमा माॅं बगलामुखी की

 बगलामुखी माॅं की महिमा अपार  सुन लो कथा उनकी बारम्बार  धरती पर जब संकट छाया श्री हरि ने माॅं का ध्यान लगाया  तब ही माॅं ने लिया अवतार  सुन लो कथा उनकी बारम्बार  बगलामुखी माॅं की महिमा अपार  सुन लो कथा उनकी बारम्बार  पीत वर्ण में अद्भुत लगतीं  जिह्वा शत्रु की कर में रखतीं  संकट हरतीं हैं मॉं निर्विकार  सुन लो कथा उनकी बारम्बार  बगलामुखी माॅं की महिमा अपार  सुन लो कथा उनकी बारम्बार ।।

आ रहे हैं श्री राम

सज गया अयोध्या धाम  गा रहे सब मंगल गान  नगर में /अवध में आ रहे हैं श्री राम  चौदह वर्ष वन में बिताया रावण वध कर मान बढ़ाया  सिया लखन संग लौटे धाम अवध में आ रहे हैं श्री राम  सज गया अयोध्या धाम  गा रहे मंगल गान  नगर में/अवध में आ रहे हैं श्री राम  सुन खबरिया माॅं हर्षाईं / मुस्काईं आरती थाल सजा कर लाईं देख  भरत - शत्रुघ्न निहाल अवध आ रहे हैं श्री राम सज गया अयोध्या धाम  गा रहे सब मंगल गान  अवध में / नगर में आ रहे हैं श्री राम  कोयल कूके मोर इतराएं वन-उपवन पुष्प बरसाएं  नर - नारी सब करें प्रणाम  अवध में/ नगर में आ रहे हैं श्री राम ।। सज गया अयोध्या धाम  गा रहे सब मंगल गान  अवध में / नगर में आ रहे हैं श्री राम।।

दिव्य कुंभ

 ये दिव्य कुंभ है , भव्य कुंभ है , महाकुंभ है अपना इसमें स्नान - ध्यान का है हर प्राणी का सपना  दानव - दैत्य में हुआ रण लेने को अमृत कलसा उज्जैन , प्रयाग , नासिक ,हरिद्वार में तब अमृत कण बरसा  है संगम रेती , प्रयाग धाम में कल्पवास का सपना  ये दिव्य कुंभ है , भव्य कुंभ है , महाकुंभ है अपना इसमें स्नान - ध्यान का है हर प्राणी का सपना  संतों की भी भव्य कुंभ में होती स्नान की इच्छा  स्नान राजसी के हों साक्षी माॅंगे पुण्य की भिक्षा करें दान सत्संग करें सब देखें मोक्ष का सपना ये दिव्य कुंभ है , भव्य कुंभ है , महाकुंभ है अपना इ समें स्नान - ध्यान का है हर प्राणी का सपना ।।

उठो माॅं श्रृंगार करो

 उठो मात श्रृंगार करो अब तुम्हें धरा पर आना है माथे पे लगा लो तुम बिंदिया   सिंदूर से भर लो तुम मंगिया नैनों में ममता का भाव लिए  अब तुम्हें धरा पर आना है  तुम उठो माॅं श्रृंगार करो  अब तुम्हें धरा पर आना है  हस्त में अपने कमल लिए  और हाथ में अपने शंख लिए  आंचल में भर आशीष लिए  अब तुम्हें धरा पर आना है  तुम उठो माॅं श्रृंगार करो  अब तुम्हें धरा पर आना  है  कर में अपने त्रिशूल लिए  और सिंह की सवारी किए दुष्टों का वध करने के लिए  अब तुम्हें धरा पर आना है  तुम उठो माॅं श्रृंगार करो  अब तुम्हें धरा पर आना है ।।

सोचा ना था

सदा तुमने अपने मन की की, ना सुनते थे बात किसी की। फिर क्यों मानने लगे थे मेरी, जब फोन पर बताते थे तकलीफ़ अपनी। मैं समझाती— डॉक्टर का कहा कर लो थोड़ा-थोड़ा, तुम कहते— कहती हो बिटिया, तो कर लूँगा। मेरी बात का मान भी रखते थे, यह माँ मुझे बताती थीं— तुम इतनी मानोगे मेरी, सोचा न था। वीडियो कॉल पर कहा था तुमने— "तकलीफ़ बहुत है, बिटिया"। तब मैंने कहा था— "ठीक है पापा, अब तुम सो जाओ।" और तुमने यह भी मान लिया... ले ली चिर-निद्रा। सोचा न था— कहा मेरा तुम यूँ मानोगे।

असहाय वृक्ष

 छाई निराशा , वृक्षों में,  निसहाय देख रहे, कटते साथी को, व्यथित हो, मानो बोल रहे, संगी - साथी बिछड़े मेरे,  लुप्त सावन - भादों की अठखेली,  मूल हुआ दुर्बल मेरा,  काया भी, अब रुग्ण हुई,  होगा अब परिवर्तन,   परिवर्तन का, दोष ना देना  दोषी हो तुम सब ही, दे, नाम विकास का, निर्दयी , निष्ठुर बन  तुमने हमको काटा ।।