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गढ़ दिया लाल अपने

जब गौरा चलीं स्नान करने तब लेप लगाईं तन पर अपने तन से लेप उतारा माँ ने उसी लेप से गढ़ दिया लाल अपने लाल को मॉं ने प्रहरी बनाया शिव जी से उसने रण मचाया  रुद्र ने  काट दिए शीश उसके  मॉं देख बिलखीं लाल अपने जब गौरा चलीं स्नान करने  तब लेप लगाईं तन पर अपने तन से लेप उतारा मॉं ने  उसी लेप से गढ़ दिया लाल अपने  बेहाल गौरा को देख भोला डरे सब  देव मिल मॉं से विनती करें गज शीश से लाल में प्राण मिले मॉं हर्षाईं देख लाल अपने  जब गौरा चलीं स्नान करने  तब लेप लगाईं तन पर अपने  तन से लेप उतारा मॉं ने उसी लेप से गढ़ दिया लाल अपने 

मॉं भी इंसान है

माँ को देते भगवान का दर्जा , लेकिन मॉं भी आखिर है एक इंसान । दोषरहित वह भी नहीं  कभी अनजाने , कभी नादानी में  हो जाती उससे भी भूल । फिर भी बच्चों के हित का ही   मन‌ में रखती भाव । और ऐसी कोई मॉं नहीं जिससे  कभी ना हुई हो कोई भूल । बेटा हो या बेटी , आज की मॉं करती दोनों से प्रेम । रिश्ता मॉं का बच्चों से ऐसा टूट ना पाता , लगने से ठेस । बच्चों के संकट को सोच , रहती वह प्रतिपल आकुल । मॉं को जैसे होता भान , वैसे बच्चों को होता , मॉं के दुःख का भान । बेटा-बेटी में अंतर इतना— बेटी को कभी माँ थी सिखाती, अब माँ को बेटी है सिखाती, दुनियादारी की समझ भी बताती। लेकिन माँ ने देखी है दुनिया ज्यादा, इंसानों की परख भी है ज्यादा  फिर भी अनजाने में होती त्रुटि , क्योंकि वह भी है एक इंसान ।।