असहाय वृक्ष

 छाई निराशा वृक्षों में, 
निसहाय खड़े सब देखते ,
कटते अपने  साथियों को,
व्यथित हो, मानो बोल रहे -

संगी - साथी बिछड़े मेरे,
सूने हैं वन - उपवन 
 लुप्त हुई सावन की हरियाली 
नीड़ पंछियों के भी खाली ।

 दुर्बल हुआ मूल मेरा,
 काया भी अब रुग्ण हुई,
प्रकृति, जिससे मिलती शक्ति 
वह भी अब क्षीण हुई ।

होगा मौसम में परिवर्तन, 
 परिवर्तन का, दोष ना देना ,
 दोषी हो तुम सब ही,
 विकास के नाम पर
 निष्ठुर बनकर हमको काटा ।।






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