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चाहत

    आज मैं चौदह वर्ष की हो गई मध्य रात्रि उत्सव का माहौल चल रहा था तभी माँ को तेज पेट दर्द शुरु हो गया। पिताजी ने तुरंत कार निकाली और माँ को लेकर अस्पताल भागे।अब मैं कोई छोटी बच्ची तो थी नहीं कि यह ना जानूँ कि यह सामान्य पीड़ा नहीं है बल्कि प्रसव पीड़ा है।समझ नहीं आ रहा था रोती हुई पाँच साल की छोटी बहन को सँभालूँ या दिल में उठ रही टीस को।     मन में माँ-पिता जी के लिए नफ़रत उसी दिन पैदा हो गई थी जिस दिन माँ ने मुझसे चहकते हुए कहा था,”तनु तुम्हारा भाई आने वाला है।” मैंने तुरंत गुस्से में तेज आवाज़ में कहा हम दो बहनें तो हैं  फिर भाई की क्या ज़रूरत ?और तुम पार्लर के चक्कर में हम दोनों को समय तो दे नहीं पाती और अब एक भाई? इतना बोलते ही एक झन्नाटेदार थप्पड़ दिया था पिताजी ने। बोले, “भाई आने की ख़ुशी नहीं है कैसी लड़की है।”चाचू ने आकर बचा लिया था वरना और पिटाई होती। पिताजी का यह रूप पहली बार देखा था मैं और छोटी बहन दोनों सहम गए थे।     पिताजी जो फ़ेसबुक पर बेटियों के समर्थन में इतना कुछ लिखते थे सब झूठ था।इतनी बड़ी बड़ी बातें सब बकवास। उस दिन उनके चेहरे का ...

अनोखा रिश्ता

     2001 से मेरा डॉक्टरों से मिलना जुलना जो शुरू हुआ वो आजतक निरंतर बना हुआ है।यह लेख मैं डॉक्टर्स डे पर लिखना चाहती थी लेकिन किसी कारणवश ना लिख पाई। उस समय मैं अपने जीवन में आए समस्त डॉक्टरों के बारे में लिखती अभी तो केवल जिन डॉक्टर के संपर्क में सबसे ज़्यादा रही उन्हीं के बारे में लिखूँगी।       मैं अब तक जिनके संपर्क में  सबसे ज्यादा रही उनका नाम है डॉ अमित मोहन। एक पेशेंट अपने डॉ के संपर्क में कब आया यह उसे याद रहता है लेकिन डॉ के संपर्क में पेशेंट आया यह अगर डॉ को याद रहता है तो पक्का पेशेंट खास (विचित्र)है ।     कल जब डॉ अमित से मिलने गई (पहली बार दिखाने नहीं) तो मुझे देखते ही बोले, ”मुझे मालूम था कि आपको कुछ नहीं होगा”। असल में कोरोना वैक्सीन की दूसरी डोज़ के बाद मेरी तबियत ज्यादा बिगड़ रही थी, साँस लेने में इतनी दिक़्क़त थी कि लगता था मृत्यु हो जाती तो ठीक रहता। उस समय जब मैंने इन्हें अपनी तकलीफ़ बताई तभी इन्होंने कहा कि “आपको कुछ होने से पहले मुझे मालूम हो जाएगा। हाँ दिक़्क़त ज़्यादा लगे तो एडमिट हो जाइएगा वैसे आपको होगा कुछ नहीं”। ...

घर

    कहा जाता है एक मकान को “घर” औरत ही बनाती है।बिना औरत “घर” भूतों का डेरा लगता है।दो शब्दों से बने “घर” ने  आज फिर मन में उथल-पुथल मचा दी है।हम महिलाओं का घर है कहाँ?उम्र के इस पड़ाव में यह प्रश्न बहुत कचोटता है कि हम महिलाओं का “घर” कहाँ है? लड़की के जन्म लेते ही मान लिया जाता है कि वो परायी है फिर जैसे ही वह होश सम्भालती है उसको भी यह एहसास कराया जाता है कि उसे दूसरे घर जाना है और वही दूसरा “घर” ही उसका अपना घर होगा।विवाहोपरांत जहाँ जन्म लिया ,25-26 साल तक जिसे अपना घर समझा वह मायका हो जाता है और जहाँ विदा होकर गई वह ससुराल।      मायके में कुछ शौक पूरे करना चाहा तो यह सुनने को मिलता था अपने “घर”जाकर पूरा करना,अपने “घर”आयी तो उस शौक को पूरा करने के लिए यह सुनना पड़ता है कि अपने “घर”से करके आती।बार-बार असमंजस की स्थिति कि कौन से घर को अपना कहें।क्योंकि (हम महिलाएँ)जब ससुराल से मायके जाती हैं तब कहती हैं अपने “घर” जा रहे और जब मायके से ससुराल तब भी कहती हैं अपने “घर” जा रहे।हम महिलाएं दोनों घरों को अपना मान रहे लेकिन वो दोनों घर हम लोगों को अपना नहीं मानते...

सपने

अजीब होते हैं सपने कभी डरावने,कभी सुहावने कब कौन चुपके से आकर मन खुश कर जाए और कब कौन रुला कर चला जाए कब किस बात पर रुला दे , कब हँसा दे कब एक देस से दूसरे देस पहुँचा दे कब बिछड़ों से मिला दे कब वियोग का दुख दे दे वाकई बहुत अजीब होते हैं सपने। कब हिम्मत बढ़ा दे कब घटा दे कब डर से थर थराहट पैदा कर दे किसी का इस पर जोर नहीं वाकई बहुत अजीब होते हैं सपने।

प्रफुल्लित मन

आज फिर उदासी छाई है स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन रहता है आज शरीर फिर अस्वस्थ है अस्वस्थ शरीर में प्रफुल्लित मन कहाँ से लाऊँ थक गई हूँ,  कब स्वस्थ हूँगी ज्ञात नहीं नित नए कष्ट  कभी शारीरिक कभी मानसिक अब कहाँ से हिम्मत लाऊँ टूट रही हूँ बिखर रही हूँ इस परिस्थिति में कुछ ताने मार जाते हैं कुछ हिम्मत बढ़ा जाते हैं उदासी में वही ताने याद आते हैं क्यूँ ना उन तानों को भूल जाऊँ जैसे मैसेज डिलीट करती हूँ क्यूँ ना उन तानों को डिलीट करूँ, हिम्मत बढ़ाने वाली बातों को ही सेव करूँ। फिर हिम्मत बाँध रही हूँ  लड़ने को तैयार हो रही हूँ उदासी से बिमारी बढ़ती है इस सत्य को जान चुकी हूँ। पुनः मन ने ठान लिया है अब प्रफुल्लित ही रहना है जिन्होंने ताने मारे हैं उनको स्वस्थ होकर दिखाना है।

मेंहदी

सर्वप्रथम हरितालिका तीज की बहुत,बहुत बधाई।        लखनऊ में बिताए सारे त्यौहारों की बहुत अच्छी यादें हैं और हर त्यौहार से जुड़ी मजेदार घटना जिसको याद करके चेहरे पर मुस्कान ना आए ऐसा हो ही नहीं सकता। जो घटना बताने वाली हूँ उससे आप सब के चेहरे पर भी मुस्कराहट आ जाएगी।   मुझे बचपन से ही मेंहदी लगवाने का शौक रहा है।लेकिन मुझे मेंहदी रचती नहीं थी क्योंकि मेरे हाथ बहुत ठंडे रहते हैं।(मेंहदी रचने और ना रचने का संबंध पति या सास के चाहने या ना चाहने से बिल्कुल नहीं है।इसलिए अगर मेंहदी रच रही तो  इस गफलत में ना रहे कि आपके पति आपसे बहुत प्यार करते हैं, उन पर निगाह रखिए😜) अब हाथ पहले से थोड़ा गरम रहने लगा है और मेंहदी कोन में केमिकल पड़ा होता है तो थोड़ा रच जाती है।    सगाई और शादी पर मेरी भाभी की लड़की रिंकी और बहन महिमा ने बहुत मेहनत से बहुत सुन्दर मेंहदी लगाई थी लेकिन जब रिंकी सुबह -सुबह यह देखने आई कि मेंहदी कितनी रची है ? तब उसका पारा सातवें स्थान पर पहुँच गया बोली “आग लगे इस हाथ को,क्या करें कि रच जाए” वो अपना गुस्सा उतार रही थी और मैं किंकर्तव्यविमूढ़...

इंतजार

 आज मन फिर उदास है आँखें थक गईं उनका रास्ता देखते। कब आएँगे ? इस इंतजार में छोड़ दिया सोना उनमें क्या खास है ! जो आज मन फिर उदास है प्रातः उम्मीद जागी थी शायद मध्यान्ह में आएंगे किन्तु फिर निराशा हाथ आई। नए शहर में वे ही मेरे साथी थे उनका मध्यान्ह में एक-एक कर आना मिलकर दाना चुगना दाने चुगते-चुगते एक-साथ उड़ जाना गिल्लू का उनसे पहले आना कहाँ गए सब  आज भी ना आए लगता है रूठे हैं मुझसे मैं भी मना लूँगी आज ना आए तो क्या ?  कल आएँगे  कल फिर उनकी राह देखूँगी जब वे आएँगे तो मैं खिल उठूँगी आज उदास हूँ तो क्या कल ना उदास रहूँगी।