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सपने

अजीब होते हैं सपने कभी डरावने,कभी सुहावने कब कौन चुपके से आकर मन खुश कर जाए और कब कौन रुला कर चला जाए कब किस बात पर रुला दे , कब हँसा दे कब एक देस से दूसरे देस पहुँचा दे कब बिछड़ों से मिला दे कब वियोग का दुख दे दे वाकई बहुत अजीब होते हैं सपने। कब हिम्मत बढ़ा दे कब घटा दे कब डर से थर थराहट पैदा कर दे किसी का इस पर जोर नहीं वाकई बहुत अजीब होते हैं सपने।

प्रफुल्लित मन

आज फिर उदासी छाई है स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन रहता है आज शरीर फिर अस्वस्थ है अस्वस्थ शरीर में प्रफुल्लित मन कहाँ से लाऊँ थक गई हूँ,  कब स्वस्थ हूँगी ज्ञात नहीं नित नए कष्ट  कभी शारीरिक कभी मानसिक अब कहाँ से हिम्मत लाऊँ टूट रही हूँ बिखर रही हूँ इस परिस्थिति में कुछ ताने मार जाते हैं कुछ हिम्मत बढ़ा जाते हैं उदासी में वही ताने याद आते हैं क्यूँ ना उन तानों को भूल जाऊँ जैसे मैसेज डिलीट करती हूँ क्यूँ ना उन तानों को डिलीट करूँ, हिम्मत बढ़ाने वाली बातों को ही सेव करूँ। फिर हिम्मत बाँध रही हूँ  लड़ने को तैयार हो रही हूँ उदासी से बिमारी बढ़ती है इस सत्य को जान चुकी हूँ। पुनः मन ने ठान लिया है अब प्रफुल्लित ही रहना है जिन्होंने ताने मारे हैं उनको स्वस्थ होकर दिखाना है।

मेंहदी

सर्वप्रथम हरितालिका तीज की बहुत,बहुत बधाई।        लखनऊ में बिताए सारे त्यौहारों की बहुत अच्छी यादें हैं और हर त्यौहार से जुड़ी मजेदार घटना जिसको याद करके चेहरे पर मुस्कान ना आए ऐसा हो ही नहीं सकता। जो घटना बताने वाली हूँ उससे आप सब के चेहरे पर भी मुस्कराहट आ जाएगी।   मुझे बचपन से ही मेंहदी लगवाने का शौक रहा है।लेकिन मुझे मेंहदी रचती नहीं थी क्योंकि मेरे हाथ बहुत ठंडे रहते हैं।(मेंहदी रचने और ना रचने का संबंध पति या सास के चाहने या ना चाहने से बिल्कुल नहीं है।इसलिए अगर मेंहदी रच रही तो  इस गफलत में ना रहे कि आपके पति आपसे बहुत प्यार करते हैं, उन पर निगाह रखिए😜) अब हाथ पहले से थोड़ा गरम रहने लगा है और मेंहदी कोन में केमिकल पड़ा होता है तो थोड़ा रच जाती है।    सगाई और शादी पर मेरी भाभी की लड़की रिंकी और बहन महिमा ने बहुत मेहनत से बहुत सुन्दर मेंहदी लगाई थी लेकिन जब रिंकी सुबह -सुबह यह देखने आई कि मेंहदी कितनी रची है ? तब उसका पारा सातवें स्थान पर पहुँच गया बोली “आग लगे इस हाथ को,क्या करें कि रच जाए” वो अपना गुस्सा उतार रही थी और मैं किंकर्तव्यविमूढ़...

इंतजार

 आज मन फिर उदास है आँखें थक गईं उनका रास्ता देखते। कब आएँगे ? इस इंतजार में छोड़ दिया सोना उनमें क्या खास है ! जो आज मन फिर उदास है प्रातः उम्मीद जागी थी शायद मध्यान्ह में आएंगे किन्तु फिर निराशा हाथ आई। नए शहर में वे ही मेरे साथी थे उनका मध्यान्ह में एक-एक कर आना मिलकर दाना चुगना दाने चुगते-चुगते एक-साथ उड़ जाना गिल्लू का उनसे पहले आना कहाँ गए सब  आज भी ना आए लगता है रूठे हैं मुझसे मैं भी मना लूँगी आज ना आए तो क्या ?  कल आएँगे  कल फिर उनकी राह देखूँगी जब वे आएँगे तो मैं खिल उठूँगी आज उदास हूँ तो क्या कल ना उदास रहूँगी।

मुस्कराइए आप लखनऊ में हैं

 लखनऊ का नाम सुनकर मुस्कराहट आ ही जाती है।लेकिन आज मन भारी है पहला त्यौहार है जानकी के बिना।13 1/2 साल रही हूँ लखनऊ में।बहुत यादें हैं।दिल कह रहा है वो यादें आप सब के साथ बाँट लूँ। नवम्बर 2007 में दिल्ली से लखनऊ आई थी।आद्या सवा दो साल की थी ।बातूनी भी थी और अपनी चंचलता से लोगों का मन भी मोह लेती थी।उसी ने घर के ठीक सामने बिष्ट अंकल से दोस्ती की थी।दिसम्बर में किडनी इंफेक्शन के कारण आद्या को admit करना पड़ा वो ठीक भी नहीं हो पाई कि मुझे स्पाइंडलो आर्थराइटिस हो गया उस समय लगा इससे अच्छे तो दिल्ली में ही थे। धीरे-धीरे लोगों से मेरा भी परिचय बढ़ने लगा।बिष्ट अंकल और शर्मा आंटी  से ज्यादा ही लगाव हो रहा था।फिर परिचय हुआ जानकी से(बिष्ट अंकल की बड़ी बहू)फिर उसके पूरे परिवार से।अब तो कोई कह ही नहीं सकता कि हम दो परिवार हैं।एक ने तो पूछ लिया था मुझसे आप इनकी रिश्तेदार हैं क्या ? जानकी,उसके पति आनंद (जिनको मैं हमजोली बोलती हूँ)और मैं हम लोगों की तिकड़ी बन गई,जो अभी तक बरकरार है।हमारे बच्चों की भी तिकड़ी बन गई।बच्चों में कभी कभार झगड़ा हो जाया करता था लेकिन थोड़ी देर में सब ठीक। जानकी के ...

लिंग भेद

 लखनऊ में एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक लड़की एक टैक्सी ड्राइवर को पीटती है बाद में ज्ञात होता है कि टैक्सी ड्राइवर की कोई गलती नहीं थी। इसी पर मन में विचार आया कि आज आप सब से पूछूँ कि क्या लड़की ने उचित किया ? निःसंदेह आप सब कहेंगे क्या पागलपन वाला प्रश्न पूछ रहे हैं । यह सब आप इसलिए कह रहे क्योंकि वहाँ सीसीटीवी लगा था।ना लगा होता तब, ऑटो वाले ने पलटकर एक झापड़ लड़की को लगा दिया होता तब, क्या आप सब ऑटो वाले के साथ होते ? जरा सोचिए हमारा समाज किस ओर जा रहा है, क्या हमारे समाज में लिंग भेद खत्म हो गया है ? बहुतायत का जवाब होगा, हाँ। अब कहाँ बेटा-बेटी में भेद होता है ।जिनकी बेटियाँ हैं वो कहेंगे मेरी बेटियाँ ही मेरे बेटे हैं या मेरी बेटियाँ बेटों से कम नहीं हैं । अगर यही जवाब है तो सच मानिए भेद-भाव अभी भी हो रहा है।सोच रहे होंगे कैसे ? आज हम सब बेटियों को बढ़ावा देने के चक्कर में बेटों को नज़रअंदाज कर रहे हैं । हम लोग खान-पान,पहनावा,सुख-सुविधा,पढ़ाई सब तो एक जैसा रख रहे लेकिन सुरक्षा व संस्कार देने में चूक रहे हैं । हम सब मानकर बैठे हैं कि लड़के ही लड़कियों के साथ गलत व्यवहार करते...

बस अब बस

 बस अब बस बहुत हुआ कोरोना। जिधर देखो उधर  मनहूसियत तुमने फैलाई है। बस अब बस  बहुत हुआ कोरोना। माना अभी हम सब डरे हुए हैं पर अब नहीं। माना तुमने हमारी कमजोरी पहचानी है लेकिन हम मनुष्यों ने भी तुमको बहुत नहीं,तो थोड़ा तो जाना ही है। बस अब बस  बहुत हुआ कोरोना। इस डर को अब मिटाना है तुम्हारी कमजोरी से ही तुमको हटाना है। बस अब बस  बहुत हुआ कोरोना। अब रोकर या डरकर नहीं हिम्मत और सावधानी से तुमको हराना है। बस अब बस बहुत हुआ कोरोना। माना अभी दवा नहीं है पर हम भी अब कमजोर नहीं है देर से ही सही जान गए हैं  मान गए हैं कि अब हर पल मास्क लगाना है भाप लेना,गरारा करना , और जीवन में योग को अपनाना है। बस अब बस  बहुत हुआ कोरोना।