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कान्हा छठी गीत

 चलो मिल चलें सब नंद दुअरिया आज है उनके लल्ला की छठिया नंद गाँव में धूम मची है ढोलक संग शहनाई बजी है चलो मिल सब बजाए आएँ थलिया आज है उनके लल्ला की छठिया चलो मिल चलें सब नंद दुअरिया आज है उनके लल्ला की छठिया जसोदा देखें बन बावरिया पल पल उतारें उनकी नज़रिया चलो मिल सब दें उनको बधइया आज है उनके लल्ला की छठिया चलो मिल चलें सब नंद दुअरिया आज है उनके लल्ला की छठिया जसोदा लाएँ देखो मुरलिया नन्द लाएँ धेनु गइया चलो मिल सब दे उनको असिसिया   आज है उनके लल्ला की छठिया चलो मिल चलें सब नंद दुअरिया आज है उनके लल्ला की छठिया।

कृष्ण जन्म गीत

 देवकी का मनवा भारी कि काहे उन्हें लालन हुए है वहीं जसोदा हरसानी कि देखो उन्हें लालन हुए हैं देवकी रोवैं, वासु सोचैं  कइसे बचाएँ इहै प्राणवा काहे उन्हें लालन हुए हैं देवकी——— जसोदा झूमें नन्द हरसायें झूम-झूम सबको बताएँ कि देखो उन्हें लालन हुए हैं देवकी ———— मथुरा में छाई कैसी उदासी कंस का जियरा भी भारी कि काहे उन्हें लालन हुए हैं देवकी——- ननद गाँव में मची ख़ुशहाली गोपियाँ नाचैं बजाकर ताली की देखो उन्हें लालन हुए हैं देवकी——

हमका दिल्ली घुमाय दा

 ए पिया हमका दिल्ली घुमाय दा  दिल्ली घुमाय दा पिया  लाल किला दिखाए दा ए पिया हमका दिल्ली घुमाय दा  सैंतालिस मा नेहरु जी आए नेहरू जी आए तिरंगा फहराए उहै ऐतिहासिक किला दिखाए दा ए पिया हमका दिल्ली घुमाय दा दिल्ली घुमाया दा पिया लाल किला दिखाए दा मुक्ति कै ख़ातिर बापू दिए प्नणवा देस कै खातिर सह लिहैं दुखवा उहै राजघाट कै दरसन करावाय दा ए पिया हमका दिल्ली घुमाय दा दिल्ली घुमाया दा पिया  लाल किला दिखाए दा अमृत महोत्सव मनावत है देसवा हर ओर गूंजे जय हिन्द कै नरवा देस कै मुखिया फहिरावैं तिरंगा  उहै मुखिया कै दरसन कराय दा ए पिया हमका दिल्ली घुमाय दा दिल्ली घुमाय दा पिया लाल किलवा दिखाए था इंडिया गेट कै सैर करवाय दा जलत मशाल हमका देखाय दा देस कै वीरन पर सीस झुकवाय कै भारत माता कै जयकारा लगवाय दा  ए पिया हमका दिल्ली घुमाय दा दिल्ली घुमाय दा पिया  लाल किलवा दिखाए दा  ।।

कजरी

 कि हरे रामा पिया बसे बिदेसवा नौकरिया बन गइल सौतनिया ना झिर-झिर बरसे सारी रतिया बदरिया घिर आई काली ना कि हरे——- दिनवा बीतै करत सब कजवा कि रतिया कइसे बीतै ना कइसे जाइब हम मंदिरवा मनवा मां चिंता भारी ना कि हरे——- सासू - ननदी बोलैं बोलिया कि देवरा हॅंसी उड़ावै ना कइसे चढ़ाइब भोले के जलवा कि पिया बसे बिदेसवा ना कि हरे——-

कजरी

 पिया चुनरी ले आई दा जयपूर से  जाइके राजदूत  से ना पिया चुनरी ले आवा ना ननदी के देखावा उहमें गोटवा लगवाइ दा चटकदार,घुघरदार देवरा से ना पिया—— माना बतिया हमार  लाया धानी लहरदार उहै चुनरी ओढ़ झूली झूला हम सावन के बयार में ना पिया——- ।।

याददाश्त

      मैं और मेरी याददाश्त,क्या ही कहूँ इसके बारे में।कभी-कभी याददाश्त के कारण बड़ी embarrassing स्थिति उत्पन्न हो जाती है।उस समय लगता है धरती फटे उसी में समा जाऊँ।और कभी-कभी बहुत चिड़चिड़ाहट होती है कि मैं ऐसी क्यों हूँ।इसी याददाश्त के आधार पर अनगिनत बार मैं “घमंडी” शब्द से भी सुशोभित हुई हूँ।       सबसे ज़्यादा ख़राब याददाश्त मेरी लड़कों और किसी वस्तु के क्रय मूल्य से संबंधित है।वस्तु का क्रय मूल्य तुरंत भूलती हूँ और लड़कों का ना नाम याद रहता है ना शक्ल।भइया के एक मित्र से तो झगड़े जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी।भइया के घर पर ना रहने की स्थिति में मुझे ही उसके दोस्तों को बताना होता था कि वो घर पर नहीं है।यह मेरे लिए बहुत भारी काम होता था, क्योंकि जैसे ही वो घर से निकलता था वैसे ही अनगिनत मित्रों का आना शुरु हो जाता था।इनमें से कुछ के नाम और शक्ल दोनों याद रहते थे तो कुछ के केवल नाम, वहीं कुछ के केवल शक्ल और कुछ के ना नाम याद रहते थे और ना शक्ल।        भइया के एक दोस्त इत्तेफाकन तभी आते थे जब वो घर पर नहीं होता। मुझे उनकी शक्ल तो याद हो ग...

अम्मा

      आज मंदिर के बाहर एक दुकान में तुतुई (जैसा जलनेति करने का लोटा होता है ठीक वैसा ही लेकिन मिट्टी का और आकार में बहुत सा) दिख गई।सच तो यह है कि मुझे उसका नाम नहीं मालूम।बचपन से तुतुई कहा तो वही लिख रही हूँ। सालों बाद तुतई देख मैं उसको ख़रीदने के लिए मचल उठी और झट से उसको ख़रीदने के लिए कार से उतर गई ।उसको ख़रीदने के उपरांत बचपन की यादों में खो गई।तुतई हो और अम्मा का ज़िक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता।       आज अम्मा हमारे बीच नहीं हैं।28 मई को अम्मा ने देह त्याग दिया।कभी-कभी दिल के रिश्ते खून के रिश्ते बढ़कर होते हैं।मेरे संबंध में यह कुछ ज़्यादा ही सटीक बैठता है।अम्मा और अम्मा के परिवार से कुछ ऐसा ही संबंध है।आज अम्मा इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनसे जुड़ी अनगिनत यादें हैं।       अम्मा के संपर्क में कब आई याद ही नहीं।दोनों घरों के आँगन के मध्य दीवार थी।अम्मा के बच्चों के विवाह या अन्य किसी प्रयोजन के लिए वो दीवार तोड़ दी जाती थी।उस दीवार में एक झरोखा भी बनाया गया था।जिससे सामान का आदान-प्रदान,बच्चों का आवागमन, मम्मी का अम्मा व अम्मा के बेट...