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कर्मकांड

    जन्म हुआ है तो मृत्यु निश्चित है । यह कहना गलत ना होगा कि गर्भ में ही मृत्यु का दिन निश्चित हो जाता है । मृत्यु पर लिखना अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन क्या करुॅं , दिलो-दिमाग में बहुत दिनों से उथल-पुथल चल रही ।        किसी अपने के जाने के उपरांत सब यह बोल कर सांत्वना देते हैं कि ," सब ऊपर वाले के हाथ में है ।" सच भी है कि सब ऊपर वाले के हाथ में है और हम केवल अपना कर्म कर सकते हैं । किसी की असमय मृत्यु निश्चित ही अत्यंत कष्टकारी होती है ।उनका जाना भी कष्टकारी होता है जो‌ आयु पूर्ण कर जाते हैं और वो अगर माता-पिता हों‌ तब कष्ट थोड़ा ज्यादा होता है । किंतु पापा के जाने के बाद यह लगा कि मृत्यु के बाद के कर्मकांड उससे ज्यादा कष्टकारी होते हैं । क्योंकि इससे पहले मैंने ये सब देखा नहीं था । (जो मैंने देखा और सुना है उसी के आधार पर लिख रही। वैसे मैं बहुत ज्यादा जानती नहीं । )      लोग कहते हैं कि तेरहवीं वगैरह करने का प्रावधान इसलिए किया गया कि लोग व्यस्तता में अपना दुःख भूल जाएं और मृतक की आत्मा को शांति मिले । सोचिए इसी में किसी की असमय मृत्यु हो त...

जब - जब माॅं को याद किया

 जब - जब माॅं को याद किया माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं  दुःख आए या सुख आए  माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं  हाथों में अपने त्रिशूल लिए माॅं, सिंह की सवारी किए  ऑंखों में अपने तेज लिए माॅं, ममतामई मुस्कान लिए  भक्तों पर अपनी कृपा करने , वो दौड़ी - दौड़ी आती हैं  जब - जब माॅं को याद किया माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं  दुःख आए या सुख आए  माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं  हाथों में अपने शंख लिए माॅं , गुड़हल माला पहने हुए  चक्षु में अपने शांति लिए माॅं, करुणा का भाव मन में लिए  भक्तों को आशीष देने, वो दौड़ी - दौड़ी आती हैं  जब - जब माॅं को याद किया  माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं  दुःख आए या सुख आए  माॅं दौड़ी - दौड़ी आती हैं।।

बिटिया रानी

 घर में आई बिटिया रानी मेरी प्यारी सी गुड़िया रानी आँखें भींचे मुट्ठी बाँधे आई है पापा की प्यारी उसकी किलकारी से घर है चहकता नन्हे पैरों में पहन वो पायल  जब रुनझुन - रुनझुन चलती तब मेरा मन विह्वल होता दादा जी का ऐनक छिपाती  दादी को छड़ी पकड़ाती  और मुझे शीतल जल दे ताली बजा वह खुश हो जाती। कभी खेलती गुड्डे - गुड़ियों से कभी उठा बैट खिलाड़ी बन जाती कभी विद्यार्थी मुझे बना शिक्षक बन मुझे पढ़ाती और कभी चुनरी को ओढ़ दुल्हन भी बन जाती  दुल्हन बन जब मुझे रिझाती तब वह मुझको कम ही भाती तत्क्षण उसकी सखी मैं बन जाती और उसको यह समझाती प्यारी बिटिया एक बात जान लो अपने जीवन के मूल्य पहचान लो शिक्षा, स्वावलंबन, उठाकर सिर को जीना है यही स्त्री का सच्चा गहना इसको है तुम धारण करना इस आभूषण से ही है तुमको संवरना आभूषित हो इस गहने से जग में मेरा नाम तुम करना॥

संकल्प शक्ति

    क्या कोई स्त्री विवाहोपरांत 30+ या‌ 40+ पर अपनी योग्यता के आधार पर अपनी पहचान नहीं बना सकती ? 50+ इसलिए नहीं लिख रही कि तब तक उनके पति सरकारी पद से सेवानिवृत्त हो गए होते हैं या होने वाले होते हैं।         प्रत्येक इंसान को स्वयं की पहचान अवश्य बनानी चाहिए ऐसा मेरा मानना है। आज इस विषय पर इसलिए लिख रही कि मैं जानती हूॅं कि बहुतों को ऐसा लगता है कि मैं अपने पति के सरकारी पद का इस्तेमाल कर "ऑल इंडिया रेडियो" में पहुॅंची हूॅं । हाॅं, बस वो मेरे समक्ष नहीं बोलते।      मैंने सबसे पहले 2015 में पहली कहानी "बालमन" लिखी थी। जिसको पढ़ने के बाद पतिदेव ने कहा "तुम लिखती क्यों नहीं ? लिखा करो।" उस वक्त लगा ऐसे ही कह दिए होंगे । लेकिन यह कहने के पीछे एक बहुत बड़ा कारण यह था कि मैं 2014 की लम्बी अस्वस्थता के कारण अवसाद से ग्रसित थी और अब मैं शारीरिक रूप से गृहकार्य करने में भी समर्थ नहीं थी । 2014 से पहले बच्चों को मैं ही पढ़ाती थी लेकिन अब उसमें भी मेरा मन नहीं लगता था। जबकि बच्चों को पढ़ाना मुझे बहुत पसंद था। इसीलिए पतिदेव को लगा कि मैं उसी में व्यस्...

तपती धरा

 बादल आए बादल आए  काले - काले बादल आए तपती धरती की प्यास बुझाने जल से भरे बादल आए देख अम्बर में जलधर को  गाछ , धरा , सरिता पुलकित  पशु - पक्षी संग हलधर हर्षित वृक्ष झूम - झूम कर  मेघों का कर रहे हैं स्वागत बैलों संग कृषक भी झूम रहे किन्तु यह क्या ! घन को चीर निकला सूरज लगता रूठ गए फिर से पयोधर  जाते देख अम्बुद को हुए पशु - पक्षी व्याकुल नर - नारी भी आकुल खिन्न मन से सब मानुष शिकवा कर रहे धरा से क्यों बारम्बार बदल रहा मौसम ? तब क्रोधित हो धरती गरजी आक्रोशित स्वर में वह बोली नहीं आएँगे अब काले घन मैंने अपनी संतान दे  दिया तुम्हें कोष अमूल्य  पर तुम तो निकले अज्ञानी पर्वत , वृक्ष , नदी सब मेरे बालक दोहन कर इनका अपार अंक सूना कर दिया मेरा किन्तु कर रही हूँ विनती मैं गोद पुनः भर दो मेरी देखोगे फिर वैसी हरियाली समय बहुत नहीं है बीता वृक्ष लगा मुझे बचा लो ऋतुएँ होगी तब अनुकूल बात मेरी गाँठ बाँध लो कुदरत से खिलवाड़ त्याग दो

अम्बुज

 किससे कहूॅं  ह्रदय की व्यथा हे अम्बुज ! बन सखा सुन लो मेरी गाथा   वेदना मेरी तुम समझना  अपने अंतस में उसको रखना   किंतु बोझ मन में ना रखना मेरे बदले तुम गर्जना अश्रु नीर‌ को समेट  उर में अपने रखना किंतु मेरे अश्रु  का अपमान ना करना  चक्षुजल बरसा कृषक  और धरा की प्यास बुझाना सखा बन तुम मेरे   मेरे अश्रु की लाज तुम रखना ।।  

बच्चों पर बढ़ता अनावश्यक दबाव

  मई माह खत्म होने को है और ज्यादातर बोर्ड अपने परिणाम घोषित कर चुके हैं। कुछ बच्चों का रिजल्ट आशा के अनुरूप होगा , कुछ का कम और कुछ का ज्यादा अच्छा होगा। अब बच्चे आगे की पढ़ाई में जुट गए हैं, "अब जुट गए" कहना पूर्णतया गलत होगा।         बच्चों पर पढ़ाई का ऐसा दबाव है कि दसवीं के रिजल्ट से पहले ही प्री-बोर्ड के नम्बर के आधार पर और बच्चे की पसंद के आधार पर बच्चा वाणिज्य,कला या विज्ञान विषय लेगा यह स्कूल वाले निर्धारित कर कक्षाएं शुरू कर देते हैं । क्या हमारे समय में डाॅ, इंजीनियर,या आईएएस -पीसीएस नहीं बनते थे ? बच्चों पर पढ़ाई का इतना दबाव क्यों है और यह दबाव ना केवल स्कूल वाले वरन् हम माॅं-बाप भी देते हैं। कुछ माॅं-बाप इसके अपवाद हो सकते हैं।और कुछ दूसरों के‌ समक्ष यह कहेंगे कि " नहीं, हमें नम्बर से कुछ मतलब नहीं,"  लेकिन फिर भी वे बच्चों पर नम्बर का दबाव बनाते हैं ।            मानती हूॅं हर क्षेत्र में प्रतियोगिता बहुत बढ़ गयी है लेकिन यह बात हम अभिभावक से ज्यादा बच्चा समझता है।फिर उस पर क्यों अनावश्यक दबाव बनाया जाए ? कुछ...