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देवी गीत

 ए पिया हमका तू दरसन कराय दा उहै मइहर वाली का दरसन कराय दा मइया क मंगिया मा सिंदुरा लगाउब सिंदूरा लगाउब मइया टिकवा पहिराउब उही सिंदुरा कलकता से मंगाय दा ए पिया हमका तू दरसन कराय दा उहै मइहर वाली का दरसन कराय दा उहै मइहर वाली के चुड़िया पहिराउब चुड़िया पहिराउब मइया मेंहदी लगाउब  उहै चुड़िया फ़िरोज़ाबाद से मगाय दा ए पिया हमका तू दरसन कराय दा उहै मइहर वाली का दरसन कराय दा उहै मइहर वाली के चुनरी उड़ाउब चुनरी ओढ़ाइब ओहमा गोटवा लगवाउब उहै चुनरी जयपुर से मंगाय दा ए पिया हमका तू दरसन कराय दा उहै मइहर वाली का दरसन कराय दा

साइकिलीया कीन ला

 ऐ राजा, अब तू साइकिलीया कीन ला साइकिलीया चलाय क वजनो घटाय ला  उही साइकीलिया पय हमका घुमाय दा ऐ राजा, अब तू साइकिलीया कीन ला।  छाती तोहार ना छप्पन इंच का  छप्पन इंच ख़ातिर साइकिलीया कीन ला।  पेट्रोलवा गाड़ी मा, ना तोहसे भराई ऐही ख़ातिर राजा, साइकिलिया कीन ला। ऐ राजा, ट्रैक्टरवा अब तू बेच दा ट्रैक्टरवा बेचकर बैलवा ख़रीद ला ट्रैक्टरवा म डीज़ल ना तोहसे भराई ऐ राजा अब तू साइकीलीया कीन ला । उही साइकीलिया पर घूँघट काढ़कर हमहूँ चलब  बोटिंग बूथ पर उहैं  कमल पर ठप्पा लगाइब  ठप्पा लगाइ क कमल के जिताइब कमल के जिताए क साइकिल बिकाइब साइकिल बिकावै ख़ातिर  साइकिलीया कीन ला । उही साइकिलीया से वजनो घटाय ला ऐ राजा अब तू साइकीलिया कीन ला।

मन की जद्दोजहद

     आज इक्कीस दिन बाद कान्हा और दुर्गा जी को सज़ा रही थी।”स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन रहता है”।पूर्णतया सत्य है अस्वस्थता के कारण ना तो कोई काम कर पा रही थी और ना ही अपने कान्हा को तैयार कर पा रही थी।होली सिर पर थी और मैं बिस्तर पर।लेकिन कान्हा के लिए तो ख़रीदारी करने का जुनून सवार था मुझपर ।पतिदेव से कहा,”चलिए ना लड्डू गोपाल के लिए कुछ ले आते हैं”।पहली बार ब्रजेश ने दुखीऔर झल्लाहट भरे स्वर में कहा,”कुछ नहीं आएगा तुम्हारे लड्डू-गोपाल के लिए।इतनी सेवा करती हो तब भी तुमको ठीक नहीं कर रहे”।पहली बार मेरी किसी माँग को नकारे थे तो मैं समझ ही नहीं पाई कि क्या जवाब दूँ।ख़ैर काफी मनुहार के बाद सामान ले आए।       जन्मदिन,होली सब बिमारी में बीत गया।बस किसी तरह कभी कान्हा को तैयार कर देती थी तो कभी ऐसे ही भोग लगा देती थी।आज पूरे इक्कीस दिन बाद मन से कान्हा को तैयार कर रही थी और दुर्गा जी का श्रृंगार कर रही थी कि मोबाइल बज उठा।देखा तो बचपन की दोस्त का फ़ोन था।बात लम्बी होती इसलिए पूजा बाद बात करने का निश्चय किया।पूजा उपरांत फ़ोन किया तो हाल-चाल पूछने के उपरांत उसने मुझस...

हवाई यात्रा

     मैं और मेरे द्वारा किए गए महान कार्य।सामान्यत: मुझसे महान कर्म हो ही जाते हैं, मैं महान जो हूँ।कभी दीवान के अंदर गिर कर आधा बंद हो जाती हूँ, कभी दुकान में शीशे वाले दरवाज़े से इतना तेज टकरा जाती हूँ कि दुकान के निचले तल के कर्मचारी हड़बड़ाते हुए ऊपर आकर पूछ लेते हैं कि “ क्या हुआ,ज़्यादा लगी तो नही ?”और कभी उल्टा हेलमेट लगाकर आद्या को डांस एकेडमी तक छोड़ आती हूँ।          महान कार्य ज्यादातर  विवाहोपरांत ही किया है क्योंकि विवाह से पूर्व बाहर बहुत ही कम निकलती थी।बाहरी दुनिया से मैं पूर्णतया अनभिज्ञ थी, यह कहना ग़लत ना होगा।किसी अनजान से मिलना-जुलना होता ही नहीं था और ना ही मैंने कभी कोई बाहरी काम किया था तो गड़बड़ी होने की संभावना ही नहीं।         लगता है घर का छोटा बच्चा उम्र के किसी भी पड़ाव पर हो वो कभी बड़ा नहीं होता।बेवक़ूफ़ी भरी हरकतें उससे होती ही रहती हैं।मेरे साथ तो ऐसा ही होता है ।इस बार तो मैंने कुछ ज़्यादा ही महान कार्य कर दिया।              हुआ यूँ कि, कुची को दिल्ली वि...

स्तब्ध

       बसंत ऋतु की ठंडी बयार,कोयल की कूक और पेड़-पौधों को मद-मस्त झूमते देखना किसे नापसंद होगा।इन्हीं सबका आनंद लेने मिली अपने बगीचे में आई थी कि अचानक उसे सिंह आंटी दिख गईं थीं।मिली की ख़ुशी ठिकाना नहीं था। हो भी क्यों ना इस मुए कोरोना में कोई दो साल बाद स्वस्थ आपके समक्ष अपनी उपस्थिति दर्ज कराए तो मन आनंद से भर उठता है।मिली बिना समय गँवाए आंटी से मिलने जाने के लिए मेनगेट खोलने ही जा रही थी कि उसके पति गौरव ने आवाज़ दी, “मिली जल्दी आओ माँ का फ़ोन आया है”। मिली भी यह सोचकर कि आंटी से मिलने पर तो बातें लम्बी हो जाएँगी बाद में आराम से बात करेगी वापिस लौट गई। गौरव के हाथ से मोबाइल लेते हुए बोली “मालूम है सिंह आंटी आ गईं”। “कब, कैसी हैं, ठीक तो हैं ना” एक साँस में गौरव मिली से पूछ बैठा। “अब मुझे क्या मालूम” मिली ने जवाब दिया और अपनी माँ से बात करने लगी।                  मिली जब ब्याह कर आई थी तब हर दोपहर कोई ना कोई महिला मिली से मिलने ज़रूर आती थी।आज के समय जैसा तब नहीं था कि प्रीतिभोज में बहू से मिल लिए बस।उन दिनों तो प्रीतिभ...

पवित्र बंधन

            इधर नीलिमा कुछ दिनों से परेशान थी ये उसकी शक्ल और हाव-भाव देखकर कोई भी बता सकता था । स्वयं से ही बार-बार प्रश्न करती थी कि क्या कोई महिला पचास वर्ष की उम्र में विवाह नहीं कर सकती ? फिर खुद ही उत्तर भी देती कि जब पुरुष पचास वर्ष की उम्र में विवाह कर सकता है तो महिला क्यों नहीं ?अपने मनमुताबिक जवाब की आशा में उसने अपने पति सुधीर से पूछ ही लिया कि, “ अगर कोई पचास वर्षीय महिला विवाह करना चाहे तो ?” सुधीर ने अख़बार पढ़ते-पढ़ते बेफ़िक्री से जवाब दिया, “ किस महिला को विवाह करना है मैं तैयार हूँ ।” कभी तो ढ़ंग से जवाब दे दिया करिए , खिन्न स्वर में यह बोलते हुए नीलिमा सुधीर के पास से चली गई ।सुधीर समझ गया कि किसी ख़ास को लेकर नीलिमा परेशान है । सुधीर ने अख़बार को एक ओर सरकाया (जबकि सुबह-सुबह चाय के साथ अख़बार को दीमक की तरह चाटने के बाद ही उठता था सुधीर ) और नीलिमा के पास जाकर पूछा किसको लेकर परेशान हो और किसको इस उम्र में विवाह करना है ?  नीलिमा ने एकदम शांत भाव से जवाब दिया ,“ मालूम नहीं उसे करना है या नहीं लेकिन मैं चाहती हूँ कि उसका विवाह हो जाए...

मिठाई

      भारतीय समाज में कोई शुभ काम हो,ख़ुशी का माहौल हो,त्यौहार हो बिना मीठे के अधूरा होता है।मीठे से अर्थ यहाँ मिठाई से है ना कि चॉकलेट से।मिठाई का स्थान चॉकलेट कभी  नहीं ले सकती। सामान्यत: मिठाइयाँ सभी को पसंद ही होती हैं, किसी को कम किसी को ज़्यादा।सब खाने के उपरांत ही मीठा खाते हैं लेकिन जानकी तो खाने के बीच में खाती है।ऐसा नहीं कि उसे मीठा पसंद नहीं बस वो जिह्नवा पर नमकीन स्वाद अंतिम में रखना चाहती है।खाने के काफ़ी शौक़ीन हैं जानकी और आनंद सिंह बिष्ट।वो दोनों ही नहीं हम- दोनों भी खाने के शौक़ीन हैं लेकिन मेरे पतिदेव को मिर्च -मसाला पसंद नहीं और मैं?अपनी पसंद के बारे में क्या लिखूँ? बस यही कहूँगी “जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए” ।😌         मुझे मिठाई में गुलाब जामुन,काला जाम,मोतीचूर का लड्डू, और बच्चे वाली मिठाई बहुत पसंद है। गुलाब जामुन और काला जाम अब मेरी क़िस्मत में नहीं।बच्चे वाली मिठाई का नाम मुझे कभी याद नहीं रहता।पहली बार पापा ने जगराम की दुकान में खिलाया था। छोटी थी और पहली बार खोए की मिठाई के अंदर छेने का छोटा रसगुल्ला देखा था तो ब...