जाना अधिकार है , बुलाया जाना सुख

          आज का यह लेख महिलाओं के मन में उमड़ते एक सवाल के विषय में । वो भी उन महिला विशेष वर्ग के विषय में जो मेरी हमउम्र हैं , या मुझसे कुछ साल बड़ी या कुछ साल छोटी ।
             मुझे लोकगीत सुनना पसंद है और गाना गाना भी सीखती हूॅं तो इसी क्रम में एक दिन मैंने बंदिनी फिल्म के "अब के बरस भेज भैया को बाबुल " सीखने की इच्छा जाहिर की । उस वक्त मैंने इस गीत की गहराई को समझा । उसी दौरान लोकगायिका उर्मिला श्रीवास्तव जी का "नइहरे से भईया नाही अइले हो रामा, बितले फगुनवा " सुना । तभी से उधेड़बुन में हूॅं ।
              क्या हम महिलाओं को मायके से बुलावे के बाद ही मायके जाना चाहिए ? हम महिलाओं का मायके से लगाव छूटना असंभव है । जिसने हमें जन्म दिया , पाला - पोसा उससे भावनात्मक जुड़ाव जीवन भर बना रहता है । विज्ञान भी यही कहता है - माॅं की कुछ कोशिकाएं बच्चे के शरीर में कई वर्षों यहाॅं तक की जीवन भर रह सकती हैं । इसी कारण मायके और वहाॅं के रिश्तों से भावनात्मक अलगाव भी आसान नहीं होता ।
             अब मूल प्रश्न यह है कि क्या विवाह के बाद हम महिलाओं को बिना बुलाए मायके जाना चाहिए कि नहीं ? पहले महिलाएं इतनी सक्षम नहीं होती थीं कि खुद से मायके जा सकें और इतनी स्वतंत्र भी नहीं थीं कि अपने मन की बात किसी से कह सकें तब वो अपने मन की बातों को गीतों में ढाल कर अपनी बात कह देती थीं । और यही नियम भी था कि बहन - बेटी को लोग लिवाने जाते थे। मेरे पिताजी का भी यही कहना था कि , बिना बुलाए मायके नहीं जाना चाहिए ।" क्यों ? यह मैंने कभी पूछा नहीं । बस , जब वो मुझे मेहमान कहते थे तब मैं गुस्सा जाती थी ।
             आज लड़कियां अपने पैर पर खड़ी हैं, अब उनको बुलावे की आवश्यकता नहीं है और ना ही उन्हें किसी के लिवा लाने की आवश्यकता है । पहले लोगों के पास समय होता था तो लिवाने चले जाते थे । अब परिवार एकल हो गए हैं तो अब किसी के पास समय नहीं है कि वो लिवाने जाएं ।
         " नइहरे से भईया नाही अइले हो रामा " जब इस गीत का स्टेटस लगाया तो मेरी एक मित्र ने कमेन्ट किया कि ," अब कहाॅं आते हैं , सब अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं और बहनें समर्थ होने के बाद भी मायके की बाट जोहती हैं ।" बात भी सही है हम महिलाएं सक्षम होते हुए भी बुलावे की बाट जोहती हैं । आखिर क्यों ?
            
        सच्चाई यही है कि आज की महिलाएँ सक्षम हैं। वे बिना बुलावे के भी अपने मायके जा सकती हैं। उन्हें किसी के लिवा आने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी मायके से बुलावे की प्रतीक्षा बनी रहती है। क्योंकि वह बुलावा केवल आने का निमंत्रण नहीं होता, बल्कि इस बात का एहसास भी होता है कि वहाँ आज भी कोई हमें उतनी ही आत्मीयता से याद करता है, जितना पहले करता था।
             शायद इसी कारण समर्थ होने के बावजूद महिलाओं के मन में कहीं न कहीं मायके से बुलावे की चाह बनी रहती है। जाना अपने अधिकार से हो सकता है, लेकिन बुलाया जाना अपनेपन का सुख देता है।
             
             

Comments

  1. Jab samanta ka baat hoti hai to wo har jagah lagoo hoti hai. Pahle maryadaon ki bandish purush pradhan vyawastha mein thi aur vittiya swatantrata nahi thi. Ab swayam jab awashyakta samjhe jaane mein koi anuchit baat nahi hai. Manushya ko swayam swatantr nirnay lene chahiye. Bahut hardik marm ki baat likha aapne. Rochak aur sundar lekhan hai.

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  2. Likha acha hai di lekin humey nahi lagta ab koi bulawe ka intezar karta hai…jab man karta hai tab bas pahuch jatey hain ghar…😍

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  3. aaj kal ke time me bas phone hi sare rishton ki bagdor sambhale hua hai .....apnepan ke sath😀😀

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  4. Ati sunder baat kahi aapne aakhiri pankti mein ...पूरे लेख का सार & स्त्री हृदय का उदगार- बदलते समय ने अधिकार भाव को मुखर कर दिया है, फिर भी जब मायके से बार बार बुलावा आता हैं, तो अलग ही खुशी भी होती है & अधिकार और प्रबल हो जाता है 💓

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  5. जब मायके से बुलावा आता तो एक अलग ही खुशी होती है कि आज भी हमें कोई हमारी मायके में याद करता है आज भी मायके जाने की खुशी अलग ही होती है

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  6. जहाँ प्रेम है वहाँ अधिकार और बुलावे की ज़रूरत नहीं होती। बाक़ी बिन प्रेम चाहे स्त्री अधिकार समझे या बुलावे का इंतज़ार करे सब अर्थहीन हैं। 😂🙏

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  7. मैं भी इस बात से सहमत हूँ कि जहाँ प्रेम है वहीं अधिकार होता है।एक मायका ही है जहाँ प्रेम से अधिकार माँग लीजिए और न मिले तो अधिकार से प्रेम ले लीजिए, दोनों चलता है। यहाँ पर किसी तरह का किंतु-परंतु नहीं सोचना चाहिए।

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  8. .मायका का अर्थ ही है जहाँ अधिकार का आत्मविश्वास और प्रेम की संवेदनशीलता दोनों साथ-साथ चलें। बेटी को यह महसूस हो कि मायका उसका अपना घर है, और परिवार भी उसे हमेशा खुले दिल से अपनाए। यही रिश्तों की सबसे बड़ी ताकत है।ऐसे में बुलाने पर जाना या बिन बुलाए जाना कि बजाय बस अपने घर जल्दी जल्दी जाना। जब मन करे उठा लो झोला और जी लो जिंदगी

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